भाषा की दीवार और सपनो की उडान
सोनभद्र के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ प्रतिभा और अवसर के बीच सबसे बड़ी खाई भाषा बनती जा रही है।
( सोनभद्र से पार्वती पांडे की रिपोर्ट)
अंग्रेज़ी को सफलता, प्रतिष्ठा और करियर की अनिवार्य शर्त मान लिया गया है। ऐसे में वे छात्र, जिनकी प्रारंभिक शिक्षा हिंदी या किसी क्षेत्रीय भाषा में हुई है, प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा की दौड़ में खुद को हाशिए पर महसूस करते हैं। प्रश्न यह नहीं है कि ग्रामीण छात्र काबिल हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या अंग्रेज़ी भाषा योग्यता का अंतिम पैमाना होनी चाहिए?
ग्रामीण छात्रों पर अंग्रेज़ी शिक्षा का प्रभाव: जड़ में क्या है समस्या?
ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकांश स्कूलों में आज भी संसाधनों की भारी कमी है। प्रशिक्षित अंग्रेज़ी शिक्षकों का अभाव, आधुनिक लाइब्रेरी और भाषा-अनुकूल वातावरण की कमी छात्रों को शुरू से ही कमजोर स्थिति में डाल देती है। जब यही छात्र आगे चलकर UPSC, SSC, बैंकिंग, NEET, JEE या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, तो उन्हें विषय से पहले भाषा से जूझना पड़ता है।
कई बार छात्र गणित, विज्ञान या सामान्य अध्ययन की अवधारणाएँ समझ लेते हैं, लेकिन अंग्रेज़ी में पूछे गए प्रश्नों की जटिल भाषा उनका आत्मविश्वास तोड़ देती है। नतीजा—कम अंक, चयन से वंचित होना और भीतर ही भीतर यह भावना कि “शायद हमे अंग्रेज़ी का ज्ञान आज के दौर में आवश्यक है, इसमें कोई संदेह नहीं।
लेकिन इसे प्रतिभा का एकमात्र पैमाना बना देना लाखों ग्रामीण छात्रों के सपनों के साथ अन्याय है। सही मार्गदर्शन, सुलभ संसाधन और सकारात्मक सोच के साथ ग्रामीण छात्र भी हर मंच पर अपनी क्षमता साबित कर सकते हैं।
जब भाषा की दीवार गिरेगी, तभी सपनों को असली उड़ान मिलेगी





