राखड़ प्रदूषण से पेड़-पौधों को भारी नुकसान, पर्यावरण और स्वास्थ्य पर खतरा
पिपरी ( सोनभद्र) पिपरी रेंज क्षेत्र में राखड़ (फ्लाई ऐश) का बढ़ता प्रभाव अब पेड़-पौधों और पूरे पर्यावरण तंत्र के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
स्थानीय सूत्रों का आरोप है कि क्षेत्राधिकारी अपने निजी स्वार्थ के कारण इस समस्या पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, जिससे वनस्पतियों और आम नागरिकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
🌿 पौधों पर राखड़ का हानिकारक प्रभाव
जब वातावरण में राखड़ की मात्रा बढ़ जाती है, तो पौधों को कई प्रकार से नुकसान पहुंचता है:
1. प्रकाश संश्लेषण में बाधा
राख के बारीक कण पत्तियों पर जम जाते हैं, जिससे पत्तियों के रोमछिद्र (स्टोमेटा) बंद हो जाते हैं।
इससे पौधे कार्बन डाइऑक्साइड और सूर्य का प्रकाश पर्याप्त मात्रा में ग्रहण नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप पौधे मुरझाने या जलने लगते हैं।
2. मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट
राखड़ में आर्सेनिक, सीसा और पारा जैसी भारी धातुएं पाई जा सकती हैं। यह मिट्टी के pH स्तर को प्रभावित करती हैं, जिससे जड़ें आवश्यक पोषक तत्व अवशोषित नहीं कर पातीं और पेड़ों की वृद्धि रुक जाती है।
3. विकास में रुकावट
पत्तियों पर राख की परत जमने से उनका तापमान बढ़ जाता है, जिससे कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और पौधों का विकास प्रभावित होता है। कई स्थानों पर पेड़ों की जड़ें भी सूखने लगी हैं।
🌍 पर्यावरण और स्वास्थ्य पर प्रभाव
राखड़ केवल वनस्पतियों को ही नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रही है:
वायु प्रदूषण:
राख के सूक्ष्म कण हवा में घुलकर सांस के जरिए फेफड़ों में पहुंचते हैं, जिससे दमा, ब्रोंकाइटिस और अन्य श्वसन रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
जल प्रदूषण:
बारिश के साथ राख नदियों और तालाबों में मिल जाती है, जिससे पानी दूषित हो जाता है। यह जहरीला पानी पौधों की जड़ों और जलीय जीवों को






